बुधवार, अक्तूबर 05, 2011

शुद्ध अक़ीदा और उसके विरुद्ध चीज़ें


बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मैं अति मेहरबान और दयालु अल्लाह के नाम से आरंभ करता हूँ।

الحمد لله وحده، والصلاة والسلام على من لا نبي بعده، وعلى آله وصحبهण्

हर प्रकार की प्रशंसा और स्तुति केवल अल्लाह के लिए योग्य है, तथा अल्लाह की दया और शांति (दुरूद व सलाम) अवतरित हो उस व्यक्तित्व पर जिसके पश्चात् कोई ईश्दूत (संदेष्टा) नहीं, तथा आप की संतान और आपके साथियों के ऊपर भी।

अल्लाह की प्रशंसा व गुणगान और दुरूद व सलाम के बाद:

जब शुद्ध अक़़ीदा (आस्था) ही इस्लाम धर्म का मूल तत्व और उसका आधार है तो मैं ने उचित समझा कि यही मेरे भाषण का विषय बने, तथा कुर्आन व हदीस के धार्मिक प्रमाणों से यह बात सर्व ज्ञात है कि अक़्वाल व आमाल (कार्य और कथन) उसी समय शुद्ध होते और स्वीकार किये जाते हैं जब वे सही अक़ीदा पर आधारित हों। यदि अक़ीदा शुद्ध न हो तो उस से निकलने (निष्कर्षित होने) वाले कार्य और कथन व्यर्थ हो जायेंगे, जैसा कि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है:

وَمَنْ يَكْفُرْ بِالْإِيمَانِ فَقَدْ حَبِطَ عَمَلُهُ وَهُوَ فِي الْآخِرَةِ مِنَ الْخَاسِرِينَ ख्المائدةरू 5,

‘‘और जिस व्यक्ति ने ईमान को नकार दिया तो उसका कार्य व्यर्थ हो गया, और वह आखिरत में घाटा उठाने वालों में से हैं।’’ (सूरतुल माइदा: 5)

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَلَقَدْ أُوحِيَ إِلَيْكَ وَإِلَى الَّذِينَ مِنْ قَبْلِكَ لَئِنْ أَشْرَكْتَ لَيَحْبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكُونَنَّ مِنَ الْخَاسِرِينَ﴾ ख्الزمرरू 65,

‘‘निःसंदेह आपकी ओर भी और आप से पहले भी संदेष्टाओं की ओर वह्य की गई है कि यदि आप ने शिर्क किया तो निःसंदेह आपका कार्य व्यर्थ हो जाएगा और आप घाटा उठाने वालों में से हो जायंेगे।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 65)

इस अर्थ की आयतें और भी हैं। तथा अल्लाह की स्पष्टवादी किताब (क़ुर्आन) और उसके विश्वसनीय संदेष्टा - उनके ऊपर उनके पालनहार की ओर से सर्वश्रेष्ठ दुरुद व सलाम हो - की सुन्नत से पता चलता है कि शुद्ध अक़ीदा का सारांश: अल्लाह में विश्वास, उसके फरिशतों में विश्वास, उसकी किताबों में विश्वास, उसके संदेष्टाओं में विश्वास, अंतिम दिन (परलोक) में विश्वास तथा तक़्दीर (भाग्य) की अच्छाई और बुराई में वश्विास रखना है। यही छः चीजें उस शुद्ध आस्था (अक़ीदा) के मूल सिद्धांत हं् जिनके साथ अल्लाह की किताब अवतरित हुई है, तथा अल्लाह ने उनके साथ अपने संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा है, तथा इन्हीं सिद्वांतों के अंतर्गत वो सभी परोक्ष की बातें भी आती हैं जिन पर ईमान लाना अनिवार्य है तथा वो सभी बातें जिनकी अल्लाह और उसके पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सूचना दी है। कुर्आन व हदीस में इन छः सिद्धांतों के प्रमाण बहुत अधिक हैं, चुनाँचे उन्हीं में से अल्लाह का यह कथन है:

لَيْسَ الْبِرَّ أَنْ تُوَلُّوا وُجُوهَكُمْ قِبَلَ الْمَشْرِقِ وَالْمَغْرِبِ وَلَكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ وَالْمَلائِكَةِ وَالْكِتَابِ وَالنَّبِيِّينَ ख्البقرةरू 177,

‘‘सारी अच्छाई पूरब और पश्चिम की ओर मुँह करने में ही नहीं, बल्कि वास्तव में अच्छा वह व्यक्ति है जो अल्लाह तआला पर, परलोक के दिन पर, फरिश्तों पर, अल्लाह की किताब पर और ईश्दूतों पर ईमान (विश्वास) रखने वाला हो।’’ (सूरतुल बक़रा: 177)

और अल्लाह सर्वशक्तिमान का यह फरमान है:

آمَنَ الرَّسُولُ بِمَا أُنْزِلَ إِلَيْهِ مِنْ رَبِّهِ وَالْمُؤْمِنُونَ كُلٌّ آمَنَ بِاللَّهِ وَمَلائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ لا نُفَرِّقُ بَيْنَ أَحَدٍ مِنْ رُسُلِهِ ख्البقرةरू 285,

‘‘रसूल ईमान लाया उस चीज़ पर जो उसकी तरफ अल्लाह तआला की ओर से अवतरित हुई और मोमिन भी ईमान लाये, ये सब अल्लाह और उसके फरिश्तों पर, उसकी किताबों पर और उसके पैगंबरों पर ईमान लाये, हम उसके रसूलों में से किसी में अंतर नहीं करते।’’ (सूरतुल बक़रा: 285)

और अल्लाह सर्वशक्तिमान का यह फरमान है:

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا آمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي نَزَّلَ عَلَى رَسُولِهِ وَالْكِتَابِ الَّذِي أَنْزَلَ مِنْ قَبْلُ وَمَنْ يَكْفُرْ بِاللَّهِ وَمَلائِكَتِهِ وَكُتُبِهِ وَرُسُلِهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ فَقَدْ ضَلَّ ضَلالًا بَعِيدًا ख्النساءरू 136,

‘‘ऐ ईमान वालो! अल्लाह तआला पर, उसके रसूल पर और उसकी किताब पर जो उसने अपने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतारी है और उन किताबों पर जो उस ने उस से पहले उतारी हैं, ईमान लाओ, जो व्यक्ति अल्लाह तआला और उसके फरिश्तों और उस की किताबों और उस के रसूलों और क़ियामत के दिन को नकार दे (कुफ्र करे) तो वह बहुत दूर की गुमराही में जा पड़ा।’’ (सूरतुन निसा: 136)

और अल्लाह सर्वशक्तिमान का यह फरमान हैः

أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ إِنَّ ذَلِكَ فِي كِتَابٍ إِنَّ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ ख्الحجरू 70,

‘‘क्या आप ने नहीं जाना कि आकाश तथा धर्ती की हर वस्तु अल्लाह के ज्ञान में है। यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है। अल्लाह के लिये तो यह अति सरल हैं।’’ (सूरतुल हज्ज: 70)

जहाँ तक इन सिद्धांतों पर तर्क स्थापित करने वाली सहीह हदीसों का संबंध है तो वे बहुत अधिक हैं, जिन में से वह सुप्रसिद्ध सहीह हदीस है जिस का वर्णन इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में अमीरुल मोमिनीन उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु की हदीस से किया है कि जिबरील अलैहिस्सलाम ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से ईमान के बारे में पूछा तो आप ने उन को उत्तर दिया कि: ‘‘ईमान यह है कि तुम अल्लाह पर, उस के फरिश्तों (स्वर्गदूतों) पर, उसकी किताबों पर, उस के रसूलों पर और अंतिम दिन पर तथा अच्छी बुरी तक़दीर पर ईमान लाओ।’’ तथा इमाम बुख़ारी और इमाम मुस्लिम ने इसे साधारण परिवर्तन के साथ अबू हुरैरा की हदीस से वर्णन किया है, और इन्हीं छः सिद्धांतों से वो सभी चीज़ें निकलती हैं जिन पर अल्लाह सर्वशक्तिमान के हक़ में, परलोक के बारे में और इनके अलावा अन्य परोक्ष चीज़ों के बारे में आस्था रखना मुसलमान के ऊपर अनिवार्य है।

चुनाँचे अल्लाह पर ईमान लाने में, इस बात पर ईमान रखना है कि वही अल्लाह वास्तविक पूज्य है जो अपने सिवा सभी चीज़ों को छोड़ कर एकमात्र उपासना के अधिकृत है, क्योंकि वही बन्दों का सृष्टा, उनके ऊपर उपकार करने वाला, उनको जीविका प्रदान करने वाला, उनकी गुप्त व रहस्य और खुली चीजों का जानने वाला, तथा उनमें से आज्ञाकारियों को प्रतिफल (पुण्य) प्रदान करने और अवज्ञाकारियों को दंडित करने पर सक्षम है। और इसी उपासना के लिए अल्लाह तआला ने जिन्न और इनसान को पैदा फरमाया और उन्हें इस का आदेश दिया जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान हैः

وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنْسَ إِلا لِيَعْبُدُونِ مَا أُرِيدُ مِنْهُمْ مِنْ رِزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَنْ يُطْعِمُونِ إِنَّ اللَّهَ هُوَ الرَّزَّاقُ ذُو الْقُوَّةِ الْمَتِينُ ख्الذارياتरू 56. 58,

‘‘मैं ने जिन्नात और इंसानों को केवल इसी लिये पैदा किया है कि वे एकमात्र मेरी उपासना करें, न मैं उनसे जीविका चाहता हूँ न मेरी यह चाहत है कि वे मुझे खिलायें, अल्लाह तो स्वयं ही सब को जीविका प्रदान करने वाला और महान शक्ति वाला है।’’ (सूरतुज़ ज़ारियात: 56 - 58)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

يَا أَيُّهَا النَّاسُ اعْبُدُوا رَبَّكُمُ الَّذِي خَلَقَكُمْ وَالَّذِينَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ فِرَاشًا وَالسَّمَاءَ بِنَاءً وَأَنْزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَأَخْرَجَ بِهِ مِنَ الثَّمَرَاتِ رِزْقًا لَكُمْ فَلا تَجْعَلُوا لِلَّهِ أَنْدَادًا وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ ख्البقرةरू 21. 22,

‘‘ऐ लोगो! अपने उस रब (पालनहार) की इबादत करो जिसने तुम्हें और तुम से पहले के लोगों को पैदा किया, यही तुम्हारा बचाव है। जिसने तुम्हारे लिये धरती को बिछौना और आकाश को छत बनाया और आकाश से वर्षा बरसा कर उससे फल पैदा करके तुम्हें जीविका प्रदान की, सावधान! जानने के बावजूद अल्लाह के साझी न ठहराओ।’’ (सूरतुल बक़रा: 21-21).

तथा अल्लाह तआला ने इसी सत्य का स्पष्टीकरण करने और इसकी ओर निमंत्रण देने और इसके विपरीत (अर्थात शिर्क) से डराने और सावधान करने के लिए संदेष्टाओं को भेजा और किताबें उतारीं, जैसा कि अल्लाह सर्वशक्तिमान का फरमान है:

وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اُعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ ख्النحلरू 36,

‘‘हमने हर उम्मत में रसूल भेजा कि (लोगो!) केवल अल्लाह की उपासना करो और उस के अलावा सभी पूज्यों से बचो।’’ (सूरतुन नह्ल: 36)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَمَا أَرْسَلْنَا مِنْ قَبْلِكَ مِنْ رَسُولٍ إِلا نُوحِي إِلَيْهِ أَنَّهُ لا إِلَهَ إِلا أَنَا فَاعْبُدُونِ ख्الأنبياءरू 25,

‘‘हमने आप से पहले भी जो रसूल भेजा उसकी ओर यही वह्य (प्रकाशना) अवतरित की कि मेरे सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं, अतः तुम सब मेरी ही इबादत करो।’’ (सूरतुल अंबिया: 25)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

كِتَابٌ أُحْكِمَتْ آيَاتُهُ ثُمَّ فُصِّلَتْ مِنْ لَدُنْ حَكِيمٍ خَبِيرٍ أَلا تَعْبُدُوا إِلا اللَّهَ إِنَّنِي لَكُمْ مِنْهُ نَذِيرٌ وَبَشِيرٌ ख्هودरू 1. 2,

‘‘यह एक ऐसी किताब है कि इसकी आयतें मोहकम (मज़बूत व सुदृढ़) की गयी हैं, फिर साफ साफ बयान की गयी हंै, एक हिक्मत (तत्वदर्शिता) वाले जानने वाले की ओर से, यह कि अल्लाह के सिवा किसी की उपासना मत करो, मैं तुम को अल्लाह की ओर से डराने वाला और शुभसूचना देने वाला हूँ।’’ (सूरत हूद: 1-2).

और इस इबादत (उपासना) की वास्तविकता यह है कि: बन्दे हर प्रकार की इबादतें जैसे कि दुआ, भय, आशा, नमाज़, रोज़ा, क़ुर्बानी, नज़्र (मन्नत) और इनके अलावा अन्य प्रकार की इबादतें आज्ञाकारिता और चाहत तथा अल्लाह के लिए संपूर्ण महब्बत और उसकी महानता के प्रति नम्रता के साथ केवल अल्लाह के लिये विशिष्ट करें। तथा अधिकांश कुरआन करीम इसी महान सिद्धांत के बारे में उतरा है जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है:

فَاعْبُدِ اللَّهَ مُخْلِصًا لَهُ الدِّينَ أَلا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ﴾ ख्الزمرरू 2. 3,

‘‘तो आप अल्लाह ही की इबादत करें उसी के लिये धर्म को ख़ालिस करते हुये। ख़बरदार! अल्लाह तआला ही के लिये ख़ालिस इबादत करना है।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 2-3)

और अल्लाह तआला का फरमान है:

فَادْعُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ ख्غافرरू 14,

‘‘तुम अल्लाह को पुकारते रहो उसके लिये धर्म को खालिस करके, भले ही काफिर बुरा मानें।’’ (सूरत ग़ाफिर: 14).

तथा सहीह बुख़ारी व सहीह मुस्लिम में मुआज़ रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया कि: ‘‘अल्लाह का हक़ बन्दों के ऊपर यह है कि वे उसकी उपासना करें और उसके साथ किसी को साझी न ठहराएं।’’

तथा अल्लाह पर ईमान लाने में यह बात भी शामिल है कि उसने उपने बन्दों पर इस्लाम के जिन प्रत्यक्ष पाँच स्तंभों को अनिवार्य किया है उन पर ईमान लाया जाये और वे: ला इलाहा इल्लल्लाह और मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह (अल्लाह के अतिरिक्त कोई वास्तविक पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के संदेष्टा हैं) की गवाही देना, नमाज़ स्थापित करना, ज़कात देना, रमज़ान के रोज़े रखना और उस व्यक्ति का अल्लाह के घर (काबा) का हज्ज करना जो इसका सामथ्र्य रखता है, तथा इसके अलावा अन्य फराइज़ (कर्तव्य) जिन्हें पवित्र शरीअत (धर्मशास्त्र) ने प्रस्तुत किया है। इन स्तंभों में सब से महत्वपूर्ण और महान स्तंभ ला इलाहा इल्लल्लाह और मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह की गवाही है। ला इलाहा इल्लल्लाह की गवाही का तकाज़ा यह है कि इबादत को केवल अल्लाह के लिए विशिष्ट किया जाये और उसके अलावा की उपासना का इनकार किया जाये, और यही ‘‘ला इलाहा इल्लल्लाह’’ का भी अर्थ है, क्योंकि इसका अर्थ यह है कि: अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं। अतः अल्लाह को छोड़ कर जिसकी भी पूजा की जाए चाहे वह मनुष्य हो, या फरिश्ता हो, या जिन्न हो, या कोई अन्य चीज,़ वे सब के सब झूठे पूज्य हैं, और सत्य पूज्य केवल अल्लाह सर्वशक्तिमान है। जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है:

ذَلِكَ بِأَنَّ اللَّهَ هُوَ الْحَقُّ وَأَنَّ مَا يَدْعُونَ مِنْ دُونِهِ هُوَ الْبَاطِلُ  ख्الحجरू 62,

‘‘यह सब इस लिये कि अल्लाह ही सत्य है और उसके सिवा जिसे भी ये पुकारते हैं वह बातिल है।’’ (सूरतुल हज्ज: 62)

इस बात का उल्लेख हो चुका है कि अल्लाह तआला ने जिन्न और इनसान को इसी मूल सिद्धांत के लिए पैदा किया है और उन्हें इसका आदेश दिया है, तथा इसी के साथ अपने संदेष्टाओं को भेजा और अपनी किताबों अवतरित की हैं। अतः आप इस बिंदु पर अच्छी तरह मननचिंतन और गौर करें ताकि आप के लिए यह वास्तविकता स्पष्ट हो जाये कि किस तरह अक्सर मुसलमान इस महान मूल सिद्धांत से अनभिज्ञ हैं यहाँ तक कि उन्हों ने अल्लाह के साथ उसके अलावा अन्य की पूजा की है और उसके एकमात्र अधिकार को उसके अलावा को दे दिया है, तो ऐसी स्थिति पर अल्लाह ही सहायक है।

तथा अल्लाह सर्वशक्तिमान पर ईमान लाने के अंतर्गत, इस बात पर ईमान लाना भी है कि वही (अल्लाह) संसार का सृष्टा, उनके मामलों का प्रबंधक और जिस तरह चाहे अपने ज्ञान और शक्ति के द्वारा उनके अंदर तसर्रुफ (हेर-फेर) करने वाला है, तथा वही लोक परलोक का स्वामी और सर्वसंसार का पालनहार है, उसके अलावा कोई सृष्टा और उसके सिवा कोई पालनहार नहीं। तथा उसने बन्दों के सुधार और उन्हें उस चीज़ की ओर बुलाने के लिए जिसमें उनकी नजात (मोक्ष) और दुनिया व आखि़रत में उनकी भलाई और कल्याण है, संदेष्टाओं को भेजा और किताबें अवतरित कीं, और इन सभी चीजों में उसका कोई साझी और भागीदार नहीं। अल्लाह तआला ने फरमाया:

اللَّهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ ख्الزمرरू 62,

‘‘अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है और वही हर चीज़ की देख भाल करने वाला है।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 62)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

إِنَّ رَبَّكُمُ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ يُغْشِي اللَّيْلَ النَّهَارَ يَطْلُبُهُ حَثِيثًا وَالشَّمْسَ وَالْقَمَرَ وَالنُّجُومَ مُسَخَّرَاتٍ بِأَمْرِهِ أَلا لَهُ الْخَلْقُ وَالْأَمْرُ تَبَارَكَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ ख्الأعرافरू 54,

‘‘निःसंदेह तुम्हारा पालनहार अल्लाह ही है जिसने सब आसमानों और धरती को छः रोज़ में पैदा किया है फिर अर्श पर क़ायम (बुलंद) हुआ, वह रात से दिन को इस प्रकार छिपा देता है कि वह रात उस दिन को जल्दी से आ लेती है तथा सूरज और चांद और दूसरे सितारों को ऐसे तौर पर पैदा किया कि सब उस के आदेश के अधीन हैं। याद रखो! अल्लाह ही के लिये विश्ेिष्ट है ख़ालिक़ (सृष्टा) होना और हाकिम होना (शासन अधिकार), बहुत गुणों और विशेषताओं वाला है अल्लाह जो सर्वसंसार का पालनहार है।’’ (सूरतुल आराफ: 54).

अल्लाह पर ईमान लाने के अंतर्गत, क़ुरआन करीम में वर्णित और पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से साबित अल्लाह के अच्छे नामों और सर्वोच्च गुणों (विशेषणों) पर, उनमें बिना किसी तह्रीफ (हेर फेर और परिवर्तन) के, बिना तातील के (उन्हें अर्थहीन किए बिना), बिना तकईफ के (कोई कैफियत या विवरण निर्धारित किए बिना) और बिना तम्सील के (किसी चीज़ के समान और सहरूप ठहराये बिना) ईमान रखना, बल्कि अनिवार्य यह है कि उन्हें बिना किसी कैफियत के उसी तरह गुज़ार दिया जाए जैसे कि वे वर्णित हुई हैं, तथा उन महान अर्थाें पर ईमान रखा जिन पर वे दलालत करती है जो कि वास्तव में अल्लाह के विशेषण हैं जिनसे उसको विशिष्ट करना अनिवार्य है जिस तरह कि उसके योग्य है और वह अपनी सिफात में से किसी भी चीज़ के अंदर अपनी सृष्टि के समान और सहरूप नहीं है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ ख्الشورىरू 11,

‘‘उस जैसी कोई चीज़ नहीं, वह सुनने और देखने वाला है।’’ (सूरतुश्शूरा: 11)

और अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया:

فَلا تَضْرِبُوا لِلَّهِ الْأَمْثَالَ إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ وَأَنْتُمْ لا تَعْلَمُونَ ख्النحلरू 74,

‘‘अतः तुम अल्लाह तआला के लिये मिसालें मत बनाओ, अल्लाह तआला खूब जानता है और तुम नहीं जानते।’’ (सूरतुन नह्ल: 74).

और यही अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथियों और भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वाले अह्ले सुन्नत वल जमाअत का अक़ीदा है, तथा इसी (अक़ीदा) को इमाम अबुल हसन अल-अशअरी रहिमहुल्लाह ने अपनी किताब ‘‘अल-मक़ालात’’ में असहाबुल हदीस (मुहद्दिसीन) और अहले सुन्नत से वर्णन किया है, तथा उनके अलावा अन्य अहले इल्म व ईमान ने भी इसे उल्लेख किया है।

औज़ाई रहिमहुल्लाह ने फरमाया: जुहरी और मकहूल से सिफात (अल्लाह के विशेषणों) वाली आयतों के बारे में पूछा गया तो उन दोनों ने उत्तर दिया कि: उनको वैसे ही गुजार दो जिस तरह कि वे आई हैं। और वलीद बिन मुस्लिम रहिमहुल्लाह ने फरमाया कि: मालिक, औज़ाई, लैस बिन सअद और सुफ्यान सौरी रहिमहुमुल्लाह से सिफात के विषय में वर्णित हदीसों के बारे में प्रश्न किया गया तो सभी लोगों ने उत्तर दिया: उनको बिना किसी कैफियत और विवरण के वैसे ही गुज़ार दो जिस तरह कि वे आई हुई हैं। तथा औज़ाई रहिमहुल्लाह ने कहा कि: हम, जबकि ताबेईन पर्याप्त संख्या में मौजूद थे, कहते थे कि: अल्लाह अपने सिंहासन (अर्श) के ऊपर है तथा हम हदीस में वर्णित सिफात पर ईमान रखते हैं।’’ और जब इमाम मालिक के अध्यापक रबीआ बिन अबू अब्दुर्रहमान से ‘इस्तिवा’ (अल्लाह के अर्श पर बुलंद होने) के बारे में प्रश्न किया गया तो उन्हों ने उत्तर दिया कि: इस्तिवा अज्ञात नहीं है, और कैफियत (विवरण) समझ से बाहर (यानी अज्ञात) है, और अल्लाह की ओर से संदेश है और संदेष्टा की ज़िम्मेदारी स्पष्ट रूप से पहुँचा देना है और हमारे ऊपर पुष्टि करना अनिवार्य है।’’ और जब इमाम मालिक रहिमहुल्लाह से इसके बारे में पूछा गया तो उन्हों ने फरमाया: इस्तिवा ज्ञात (मालूम) है, कैफियत अज्ञात है, उस पर ईमान लाना अनिवार्य है और उसके बारे में प्रश्न करना बिद्अत है।’’ फिर उन्हों ने पूछने वाले से कहा कि मैं तुम्हें एक बुरा आदमी समझता हूँ और उसको बाहर निकालने का आदेश दिया, अतः उसे बाहर निकाल दिया गया। और यही अर्थ मोमिनों की माँ उम्मे सलमा रज़ियल्लाहु अन्हा से भी वर्णित है। तथा इमाम अबू अब्दुर्रहमान अब्दुल्लाह बिन मुबारक रहिमहुल्लाह ने फरमाया: हम अपने पालनहार को जानते हैं कि वह अपने आसमानों के ऊपर अपने अर्श (सिंहासन) पर है, अपनी सृष्टि से अलग थलग है।’’

इस अध्याय में इमामों की बातें बहुत अधिक हैं जिनका इस भाषण में वर्णन करना संभव नहीं है और जो व्यक्ति इस से अधिक जानकारी चाहता है तो वह इस अघ्याय में उलमा-ए-सुन्नत की लिखी हुई पुस्तकों को देखे, उदाहरण के तौर पर: अब्दुल्लाह बिन इमाम अहमद की किताब ‘‘अस्सुन्नह’’, महानात्मा इमाम मुहम्मद बिन खुजैमा की किताब ‘‘अत्तौहीद’’, अबुल क़ासिम अल- लालकाई अत्तबरी की किताब ‘‘अस्सुन्नह’’, अबू बक्र बिन अबू आसिम की किताब ‘‘अस्सुन्नह’’ तथा शैखुल इस्लाम इब्ने तैमीया का जवाब (उत्तर) हमात शहर वालों के लिये, जो कि एक महान और बहुत लाभदायक जवाब है जिसके अंदर शैखुल इस्लाम रहिमहुल्लाह ने अहले सुन्नत के अक़ीदा को स्पष्ट किया है, और उसमें उनकी बहुत सारी बातों और जो कुछ अहले सुन्नत ने कहा है उसके सही (प्रामाणिक) होने और उनके विरोधियों की बातों के असत्य होने पर शरई और अक़ली दलीलों का उल्लेख किया है। इसी तरह उनकी ‘‘अत्तदमुरियह’’ नामी पुस्तिका भी है, जिसमें उन्हों ने विस्तार से काम लिया है, और उसमें अहले सुन्नत के अक़ीदा को उसकी शरई और अक़ली दलीलों के साथ स्पष्ट किया है, तथा विरोधियों का इस प्रकार उत्तर दिया है कि नेक मक़सद और सत्य की जानकारी की अभिलाषा के साथ उसमें मननचिंतन करने वाले हर विद्वान के लिए सत्य को स्पष्ट कर देता है और बातिल को तोड़ देता है। तथा जो भी व्यक्ति अस्मा व सिफात के अध्याय में अहले सुन्नत के अक़ीदे का विरोध करेगा वह आवश्यक रूप से जो कुछ भी साबित मानता और नकारता है उसमें स्पष्ट अंतर्विरोध के साथ साथ शरई और अक़ली दलीलों के विरोध (मुख़ालफत) में पड़ जायेगा।

जहाँ तक अहले सुन्नत वल जमाअत का संबंध है तो उन्हों ने अल्लाह तआला के लिए उन सभी अस्मा व सिफात (नामों और विशेषणों) को, जिन्हें उसने अपनी किताब में अपने लिये साबित किया है या जिसे उसके संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपनी हदीस में उसके लिये साबित किया है, बिना किसी चीज़ के समान व सहरूप ठहराये हुए साबित किया है तथा अल्लाह सुबहानहु व तआला को उसकी सृष्टि के समान व सहरूप होने से इस तरह पाक व पवित्र ठहराया है कि उस से तातील (यानी उसके नामों और गुणों का अर्थहीन होना) लाज़िम नहीं आता है। इस तरह वे लोग अंतर्विरोध से सुरक्षित हो गये और सभी दलीलों पर अमल कर लिया। और यह अल्लाह सर्वशक्तिमान की परंपरा रही है कि जो व्यक्ति उस सत्य को थामे रहता है जिसके साथ उसने अपने संदेष्टाओं को भेजा है और उसमें भरपूर संघर्ष करता है तथा उसकी खोज में निःस्वार्थता से काम लेता है, तो उसे सत्य की तौफीक़ देता है और उसकी हुज्जत (तर्क) को वर्चस्व प्रदान करता है, जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है:

بَلْ نَقْذِفُ بِالْحَقِّ عَلَى الْبَاطِلِ فَيَدْمَغُهُ فَإِذَا هُوَ زَاهِقٌ ख्الأنبياءरू 18,

‘‘बल्कि हम सच को झूठ पर फंेक मारते हैं तो सच झूठ का सिर तोड़ देता है और वह उसी समय नष्ट हो जाता है।’’ (सूरतुल अंबिया: 18).

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَلَا يَأْتُونَكَ بِمَثَلٍ إِلَّا جِئْنَاكَ بِالْحَقِّ وَأَحْسَنَ تَفْسِيرًا ख्الفرقانरू 33,

‘‘ये आपके पास जो कोई मिसाल लायेंगे हम उसका सच्चा उत्तर और उत्तम व्याख्या आपको बता देंगे।’’ (सूरतुल फुरक़ान: 33).

हाफिज इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह ने अपनी प्रसिद्ध तफसीर में अल्लाह के फरमान:

إِنَّ رَبَّكُمُ اللَّهُ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ فِي سِتَّةِ أَيَّامٍ ثُمَّ اسْتَوَى عَلَى الْعَرْشِ ख्الأعرافरू 54,

‘‘निःसंदेह तुम्हारा पालनहार अल्लाह ही है जिसने सब आसमानांे और धरती को छः दिन में पैदा किया फिर अर्श पर क़ायम (बुलंद) हुआ।’’ (सूरतुल आराफ़: 54).

की व्याख्या करते समय इस अध्याय से संबंधित बड़ी अच्छी बात कही है जिसे उसकी व्यापक लाभकारिता की दृष्टि से यहाँ उल्लेख करना उचित मालूम होता है।

आप रहिमहुल्लाह ने फरमाया जिसका मूलशब्द यह हैं: ‘‘इस स्थान पर लोगों की बहुत अधिक बातें (विचारधारायें) हैं जिन्हें विस्तार के साथ वर्णन करने की यह जगह नहीं है, बल्कि हम इस स्थान पर सलफ-सालेहीन (पुनीत पूर्वजों) मालिक, औज़ाई, सौरी, लैस बिन सअद, शाफई, अहमद, इसहाक़ बिन राहवैह और इनके अलावा अन्य पुराने और वर्तमान समय के मुसलमानों के इमामों का रास्ता (मत) अपनाते हैं, और वह मत यह है कि इन्हें (अस्मा व सिफात को) बिना कैफियत और स्थिति निर्धारित किए हुए, बिना किसी चीज़ के समान ठहराए हुए और उन्हें बिना अर्थहीन किए हुए ऐसे ही गुज़ार दिया जाए (मान लिया जाये) जिस तरह कि उनका वर्णन हुआ है, तथा तश्बीह (समानता) देने वालों के दिमाग़ में प्रत्यक्ष रूप से पहले पहल जो बात आती है वह अल्लाह के बारे में अस्वीकृत है (यानी वह अल्लाह से नकारी हुई है) क्योंकि अल्लाह के समान उसकी सृष्टि में से कोई भी चीज़ नहीं है, और उसके समान कोई भी चीज नहीं है और वह सुनने वाला देखने वाला है, बल्कि मामला तो वैसे ही है जैसाकि इमामों ने कहा है, जिनमें इमाम बुखारी के अध्यापक नुएैम बिन हम्माद अल खुजाई हैं, उन्हों ने कहा: ‘‘जिसने अल्लाह की समानता उसके मख़लूक से दी उसने कुफ्र किया, और जिसने उस चीज़ का इनकार किया जिस से अल्लाह तआला ने अपने आपको विशिष्ट किया है तो उसने कुुफ्र किया, तथा अल्लाह तआला ने जिस से अपने आपको या उसके रसूल ने उसे विशिष्ट किया है उसमें कोई तश्बीह (समानता) नहीं है, अतः जिसने स्पष्ट आयतों और सहीह हदीसों के अन्दर वर्णित अस्मा व सिफात को अल्लाह के लिये इस तौर पर साबित किया जैसाकि उसकी महिमा और तेज के योग्य है तथा अल्लाह तआला से कमियों और खामियों का इनकार किया तो उसने हिदायत का रास्ता अपनाया।’’ इब्ने कसीर रहिमहुल्लाह की बात समाप्त हुई।

जहाँ तक फरिश्तों पर ईमान का संबंध है तो वह उन पर सार रूप से तथा विस्तार रूप से ईमान रखने पर आधारित है। चुनांचे मुसलमान यह विश्वास रखेगा कि अल्लाह के कुछ फरिश्ते हैं जिन को उसने अपनी आज्ञाकारिता के लिये पैदा किया है, और उनका वर्णन इन शब्दों में किया है:

عِبَادٌ مُكْرَمُونَ لَا يَسْبِقُونَهُ بِالْقَوْلِ وَهُمْ بِأَمْرِهِ يَعْمَلُونَ يَعْلَمُ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُمْ وَلَا يَشْفَعُونَ إِلَّا لِمَنِ ارْتَضَى وَهُمْ مِنْ خَشْيَتِهِ مُشْفِقُونَ ख्الأنبياءरू 26. 28,

‘‘वे सब उसके सम्मानित बंदे हैं, किसी बात में अल्लाह पर पहल नहीं करते बल्कि उसके आदेश का पालन करने वाले हैं। वह उनके आगे पीछे की सभी चीजों को जानता है, वे किसी की भी सिफारिश नहीं करते सिवाये उसके जिस से अल्लाह प्रसन्न हो, वे तो स्वयं अल्लाह के डर से भयभीत और सहमे हुए हैं।’’ (सूरतुल अंबिया: 26 - 28).

तथा फरिश्तों के बहुत प्रकार हैं, उन में से कुछ (अल्लाह के) अर्श को उठाने पर नियुक्त हैं तथा उन में से कुछ स्वर्ग और नरक के दारोगा हैं और उन में से कुछ बन्दों के कामों को सहेजने पर नियुक्त हैं। अल्लाह और उसके पैगंबर ने उनमें से जिनका नाम लिया है हम उन पर विस्तार के साथ ईमान रखते हैं जैसे - जिबरील, मीकाईल, नरक के दारोगा मालिक तथा सूर (नरसिंघा) में फूँक मारने पर नियुक्त इसराफील। इन फरिश्तों का वर्णन सहीह हदीसों के अन्दर आया है, चुनांचे सहीह हदीस में आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: ‘‘फरिश्ते नूर से पैदा किये गये हैं, जिन्नात दकहती हुई आग (शोले) से पैदा किये गए हैं और आदम उस चीज़ से पैदा किये गये हैं जिसका उल्लेख तुुम से किया गया है।’’ इसे इमाम मुस्लिम ने अपनी सहीह में रिवायत किया है।

इसी प्रकार किताबों पर ईमान लाना भी है, सार रूप से यह ईमान लाना अनिवार्य है कि अल्लाह तआला ने अपने सत्य (संदेश) को स्पष्ट करने तथा उसकी ओर लोगों को आमंत्रित करने के लिए अपने नबियों और रसूलों (ईश्दूतों और संदेश्वाहकों) पर किताबें अवतरित की हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

لَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا بِالْبَيِّنَاتِ وَأَنْزَلْنَا مَعَهُمُ الْكِتَابَ وَالْمِيزَانَ لِيَقُومَ النَّاسُ بِالْقِسْطِ ख्الحديدरू 25,

‘‘निःसंदेह हम ने अपने संदेष्टाओं को खुली दलीलें दे कर भेजा और उनके साथ किताब और मीज़ान (तराज़ू) उतारा ताकि लोग न्याय पर कायम रहें।’’ (सूरतुल हदीद: 25).

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

كَانَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً فَبَعَثَ اللَّهُ النَّبِيِّينَ مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ وَأَنْزَلَ مَعَهُمُ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ لِيَحْكُمَ بَيْنَ النَّاسِ فِيمَا اخْتَلَفُوا فِيهِ ख्البقرةरू 213,

‘‘वास्तव में लोग एक ही समूह थे, तो अल्लाह ने नबियों को शुभसूचनाएं देने वाला और डराने वाला बनाकर भेजा और उनके साथ सच्ची किताबें उतारीं ताकि लोगों के बीच विवादास्पद चीज़ों का फैसला हो जाये।’’ (सूरतुल बक़रा: 213).

तथा अल्लाह तआला ने उन किताबों में से जिनका नामों के साथ उल्लेख किया है जैसे - तौरात, इंजील, ज़बूर, क़ुरआन, उन पर हम विस्तार के साथ ईमान रखते हैं, और क़ुरआन सबसे श्रेष्ठ और अंतिम पुस्तक है, तथा वह सब का संरक्षक और उनकी पुष्टि करने वाला है, तथा वही वह पुस्तक है जिसका अनुसरण करना और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से प्रमाणित सही हदीस के साथ-साथ उसके अनुसार फैसला करना सभी समुदायों पर अनिवार्य है। क्योंकि अल्लाह तआला ने अपने पैगंबर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को सभी इंसानों और जिन्नात की ओर संदेष्टा बना कर भेजा है और आप के ऊपर इस कुरआन को अवतरित किया है ताकि इस के द्वारा आप उनके बीच फैसला करें। तथा अल्लाह तआला ने इसे दिलों की बीमारियों के लिए श्फिा (रोग निवारण), हर चीज़ को स्पष्ट करने वाला, और मोमिनों के लिए मार्गदर्शन और दया व करूणा बनाया है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَهَذَا كِتَابٌ أَنْزَلْنَاهُ مُبَارَكٌ فَاتَّبِعُوهُ وَاتَّقُوا لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ ख्الأنعامरू 155,

‘‘और यह एक किताब है जिसको हम ने अवतरित किया बड़ी ख़ैर व बरकत वाली तो इस का अनुसरण करो और डरो ताकि तुम पर दया हो।’’ (सूरतुल अनआम: 155)

और अल्ला तआला ने फरमायाः

وَنَزَّلْنَا عَلَيْكَ الْكِتَابَ تِبْيَانًا لِكُلِّ شَيْءٍ وَهُدًى وَرَحْمَةً وَبُشْرَى لِلْمُسْلِمِينَ ख्النحلरू 89,

‘‘और हम ने आप पर यह किताब उतारी है जिस में हर चीज़ का स्पष्टीकरण है और मुसलमानों के लिये मार्गदर्शन, दया और शुभसूचना है।’’ (सूरतुन् नह्ल: 89)

तथा अल्लाह तआला ने फरमाय:

قُلْ يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنِّي رَسُولُ اللَّهِ إِلَيْكُمْ جَمِيعًا الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ يُحْيِي وَيُمِيتُ فَآمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ النَّبِيِّ الْأُمِّيِّ الَّذِي يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَكَلِمَاتِهِ وَاتَّبِعُوهُ لَعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ ख्الأعرافरू 158,

‘‘आप कह दीजिये कि ऐ लोगो! मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह तआला का भेजा हुआ हूँ जिसकी बादशाही सभी आसमानों और ज़मीन में है, उस के सिवा कोई उपासना के योग्य नहीं, वही जीवन और मृत्यु देता है, अतः अल्लाह तआला पर ईमान लाओ और उसके अनपढ़ नबी पर जो कि अल्लाह तआला पर और उस के आदेशों पर ईमान रखते हैं और उनका अनुसरण करो ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो।’’ (सूरतुल आराफ: 158).

और इस अर्थ की आयतें बहुत हैं।

इसी तरह संदेष्टाओं पर भी सार और विस्तार रूप से ईमान लाना अनिवार्य है, चुनांचे हम यह ईमान रखते हैं कि अल्लाह तआला ने अपने बन्दों की तरफ उन्हीं में से कुछ रसूलों को शुभसूचना देने वाला और डराने वाला तथा सत्यमार्ग की ओर निमंत्रण देने वाला बना कर भेजा, तो जिसने उन के निमंत्रण को स्वीकार किया वह सौभाग्य से सम्मानित हुआ, और जिसने उनका विरोध किया वह विफलता और पश्चाताप का पात्र बना। तथा संदेष्टाओं की अंतिम कड़ी और सबसे श्रेष्ठ हमारे नबी मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हैं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَلَقَدْ بَعَثْنَا فِي كُلِّ أُمَّةٍ رَسُولًا أَنِ اُعْبُدُوا اللَّهَ وَاجْتَنِبُوا الطَّاغُوتَ ख्النحلरू 36,

‘‘हमने हर उम्मत में रसूल भेजा कि (लोगो!) केवल अल्लाह की उपासना करो और उस के अलावा सभी पूज्यों से बचो।’’ (सूरतुन् नह्ल: 36)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

رُسُلًا مُبَشِّرِينَ وَمُنْذِرِينَ لِئَلَّا يَكُونَ لِلنَّاسِ عَلَى اللَّهِ حُجَّةٌ بَعْدَ الرُّسُلِ ख्النساءरू 165,

‘‘हमने उन्हें रसूल बनाया है शुभसूचना देने वाले और सावधान करने वाले, ताकि लोगों की कोई हुज्जत रसूलों के भेजने के बाद अल्लाह तआला पर न रह जाये।’’ (सूरतुन निसा: 165)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

مَا كَانَ مُحَمَّدٌ أَبَا أَحَدٍ مِنْ رِجَالِكُمْ وَلَكِنْ رَسُولَ اللَّهِ وَخَاتَمَ النَّبِيِّينَ ख्الأحزابरू 40,

‘‘(लोगो!) मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं, परंतु आप अल्लाह तआला के संदेष्टा हैं और सभी ईश्दूतों के खतम करने वाले हैं।’’ (सूरतुल अहज़ाब: 40)

तथा अल्लाह ने उन पैगंबरों में से जिन का नाम लिया है या अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से जिनका नाम लेना साबित है हम उन पर विस्तार और निर्धारित रूप से ईमान लाते हंै, जैसे - नूह, हूद, सालेह, इबराहीम और इनके अलावा अन्य रसूल, उन पर, उनकी संतान तथा उनके अनुयायियों पर अल्लाह की दया और शांति अवतरित हो।

जहाँ तक आखिरत (परलोक) के दिन पर ईमान लाने का संबंध है तो इस में हर उस चीज़ पर ईमान लाना सम्मिलित है जिसकी अल्लाह और उसके पैगंबर ने मृत्यु के पश्चात्् होने वाली चीज़ांे में से सूचना दी है, जैसेकि क़ब्र का फित्ना (परीक्षा), उसकी यातना और समृधि, तथा क़ियामत (महाप्रलय) के दिन होने वाली त्रास, कठिनाईयाँ और सख्तियाँ, पुल सिरात, मीज़ान (तराज़ू), हिसाब व किताब, बदला तथा लोगों के बीच कर्म पत्रों का खोल दिया जाना, तो कोई उसे अपने दाहिने हाथ में पकड़े होगा तो कोई उसे अपने बायें हाथ में या अपनी पीठ के पीछे लिए होगा, तथा इसी के अंतर्गत हमारे ईश्दूत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के हौज़ (कौसर) पर ईमान लाना तथा स्वर्ग और नरक पर, मोमिनों के अपने पालनहार को देखने और उसके उनसे बातचीत करने पर, और इनके अलावा कुरआन करीम और अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से सहीह हदीसों में वर्णित अन्य बातों पर ईमान लाना भी आता है। अतः इन सभी चीज़ों पर ईमान रखना और उनकी उसी रूप में पुष्टि करना अनिवार्य है जिस तरह कि अल्लाह और उसके पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इन को स्पष्ट किया है।

जहाँ तक ईमान बिल-क़द्र (तक़्दीर या भाग्य में विश्वास रखने) का संबंध है तो यह चार चीज़ों पर ईमान लाने को सम्मिलित है:

प्रथम चीज़: यह कि अल्लाह तआला को हो चुकी चीज़ों और होने वाली चीज़ों की जानकारी है, उसे अपने बन्दों की स्थितियों (हालात) की जानकारी है, तथा उसे उनकी जीविकाओं, उनकी जीवनावधियों, उनके कामों और इसके अलावा उनके अन्य सभी मामलों की जानकारी है, इन में से कोई भी चीज़ उसके ऊपर रहस्य और गुप्त नहीं है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ ख्الأنفالरू 75,

‘‘निःसंदेह अल्लाह तआला हर चीज़ को भली भांति जानता है।’’ (सूरतुल अनफाल: 75)

तथा अल्लाह सर्वशक्तिमान ने फरमाया:

لِتَعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ وَأَنَّ اللَّهَ قَدْ أَحَاطَ بِكُلِّ شَيْءٍ عِلْمًا ख्الطلاقरू 12,

‘‘ताकि तुम जान लो कि अल्लाह तआला हर चीज़ पर सक्षम है और अल्लाह ने ज्ञान के एतबार से हर चीज को घेर रखा है।’’ (सूरतुत तलाक़: 12)

दूसरी चीज़: अल्लाह ने अपनी मुक़द्दर और फैसला की हुई हर चीज़ को लिख दिया है, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

قَدْ عَلِمْنَا مَا تَنْقُصُ الْأَرْضُ مِنْهُمْ وَعِنْدَنَا كِتَابٌ حَفِيظٌ ख्قरू 4,

‘‘ज़मीन जो कुछ इनमें से घटाती है वह हमें पता है और हमारे पास सब याद रखने वाली किताब है।’’ (सूरत क़ाफ: 4).

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَكُلَّ شَيْءٍ أحْصَيْنَاهُ فِي إِمَامٍ مُبِينٍ  ख्يسरू 12,

‘‘और हमने हर चीज़ को एक स्पष्ट किताब में सहेज रखा है।’’ (सूरत यासीन: 12).

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

أَلَمْ تَعْلَمْ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ إِنَّ ذَلِكَ فِي كِتَابٍ إِنَّ ذَلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرٌ ख्الحجरू 70,

‘‘क्या आप ने नहीं जाना कि आकाश और धरती की हर चीज़ अल्लाह के ज्ञान में है, यह सब लिखी हुई किताब में सुरक्षित है, अल्लाह तआला पर यह चीज़ तो बहुत आसान है।’’ (सूरतुल हज्ज: 70).

तीसरी चीज़: उसकी लागू होने वाली मशीयत (इच्छा व इरादा) पर ईमान रखना, अतः उसने जिस चीज़ को चाहा वह हुई और जिस चीज़ को नहीं चाहा वह नहीं हुई। जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

إِنَّ اللَّهَ يَفْعَلُ مَا يَشَاءُ  ख्الحجरू 18,

‘‘अल्लाह जो चाहता है करता है।’’ (सूरतुल हज्ज: 18)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

إِنَّمَا أَمْرُهُ إِذَا أَرَادَ شَيْئًا أَنْ يَقُولَ لَهُ كُنْ فَيَكُونُ﴾ ख्يسरू 82,

‘‘वह जब कभी किसी चीज़ का इरादा करता है तो उसे इतना कह देना (काफी है) कि हो जा, तो वह उसी समय हो जाती है।’’ (सूरत यासीन: 82).

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَمَا تَشَاءُونَ إِلَّا أَنْ يَشَاءَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ  ख्التكويرरू 29,

‘‘और तुम बिना सर्वसंसार के पालनहार के चाहे कुछ नहीं चाह सकते।’’ (सूरतुत-तक्वीर: 29)

चैथी चीज़: सभी अस्तित्व में आई हुई चीज़ों को अल्लाह ही ने पैदा फरमाया है उसके अतिरिक्त कोई सृष्टा और पालनहार नहीं, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

اللَّهُ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ وَهُوَ عَلَى كُلِّ شَيْءٍ وَكِيلٌ ख्الزمرरू 62,

‘‘अल्लाह हर चीज़ का पैदा करने वाला है और वही हर चीज़ का संरक्षक और निरीक्षक है।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 62)

और अल्लाह तआला ने फरमाया:

يَا أَيُّهَا النَّاسُ اذْكُرُوا نِعْمَتَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ هَلْ مِنْ خَالِقٍ غَيْرُ اللَّهِ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ فَأَنَّى تُؤْفَكُونَ ख्فاطرरू 3,

‘‘लोगो! अल्लाह तआला ने तुम पर जो अनुकंपायें की हैं, उन्हें याद करो, क्या अल्लाह के सिवा कोई और भी खालिक़ (सृष्टा) है जो तुम्हें आसमान व ज़मीन से रोज़ी पहुँचाता है ? उस के सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं। तो तुम कहाँ उलटे जाते हो।’’ (सूरत फातिर: 3).

अहले सुन्नत वल जमाअत के निकट तक़दीर पर ईमान रखना इन चारों चीज़ों पर ईमान रखने को सम्मिलित है, उन अहले बिद्अत के विपरीत जिन्हों ने इन में से कुछ का इनकार किया है।

तथा अल्लाह पर ईमान लाने के अंतर्गत यह आस्था रखना भी आता है कि ईमान क़ौल व अमल (कथन और कर्म) का नाम है जो आज्ञाकारिता से बढ़ता और अवज्ञा (पाप) से घटता है, और यह कि शिर्क (अनेकेश्वरवाद) और कुफ्र (नास्तिकता) से कमतर किसी गुनाह, जैसे- व्यभिचार, चोरी, सूदखोरी, नशीले पदार्थाें का सेवन, माता पिता की अवज्ञा और इनके अलावा अन्य बड़े गुनाहों के कारण किसी मुसलमान को काफिर कहना जाइज़ नहीं है जब तक कि वह उसे हलाल (वैध) न ठहरा ले; क्योंकि अल्लाह तआला का फरमान है:

إِنَّ اللَّهَ لَا يَغْفِرُ أَنْ يُشْرَكَ بِهِ وَيَغْفِرُ مَا دُونَ ذَلِكَ لِمَنْ يَشَاءُ ख्النساءरू 48,

‘‘निःसंदेह अल्लाह तआला अपने साथ साझी किये जाने को नहीं माफ करता और इसके सिवा जिसे चाहे माफ कर देता है।’’ (सूरतुन निसा:48)

तथा अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुतवातिर हदीसों में प्रमाणित है कि अल्लाह तआला उस व्यक्ति को नरक से निकालेगा जिसके दिल में राई के दाने के बराबर भी ईमान होगा।

तथा अल्लाह पर ईमान लाने के अंतर्गत अल्लाह के लिये महब्बत करना और अल्लाह के लिये द्वेष (बुग़्ज़) रखना, अल्लाह के लिए दोस्ती रखना तथा अल्लाह के लिए दुश्मनी रखना भी आता है। अतः एक मोमिन, अन्य मोमिनों से महब्बत करेगा और उनसे दोस्ती रखेगा, तथा काफिरों से नफरत करेगा और उनसे बैर रखेगा।

इस उम्मत के मोमिनों की प्रमुख सूचि में अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा (साथी) हैं, अहले सुन्नत वल जमाअत उनसे महब्बत करते हैं और उनसे दोस्ती रखते हैं, और यह आस्था रखते हैं कि ईश्दूतों के बाद ये लोग सबसे श्रेष्ठ लोग हैं क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का फरमान है: ‘‘लोगों में सबसे श्रेष्ठ मेरी शताब्दी के लोग हैं, फिर वो लोग हैं जो उनके बाद हैं, फिर वो लोग हैं जो उनके बाद हैं।’’ (इस हदीस के सही होने पर बुखारी व मुस्लिम सहमत हैं)। तथा यह आस्था रखते हैं कि उनमें सबसे श्रेष्ठ अबू बक्र सिद्दीक़, फिर उमर फारूक़, फिर उसमान जुन्नूरैन, फिर अली अल-मुर्तज़ा रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन हैं।

उनके बाद अवशेष दस जन्नती सहाबा हैं, फिर शेष सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम अजमईन हैं। तथा वे लोग सहाबा के बीच उत्पन्न होने वाले मतभेद और विवाद के बारे में बात करने से उपेक्षा करते हैं और यह एतिक़ाद रखते हैं कि वे इस बारे में इज्तिहाद करने वाले थे। जिसने सही हुक्म को पा लिया उसके लिए दोहरा अज्र व सवाब है और जिस से गलती होगई तो उसके लिए एक अज्र है। और वे रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ऊपर ईमान रखने वाले अहले बैत से महब्बत करते हैं और उनसे दोस्ती रखते हैं, तथा मोमिनों की माताओं अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की पत्नियों से महब्बत व वफादारी का प्रदर्शन करते हैं और उन सभी से प्रसन्नता प्रकट करते हैं, तथा उन राफिज़ियों (शीयों) के तरीक़े से उपेक्षा करते हैं जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहाबा से द्वेष (बुग़्ज़) रखते, उन को बुरा भला कहते और अहले बैत के बारे में अतिशयोक्ति से काम लेते हैं और अल्लाह ने उन्हें जो पद प्रदान किया है उस से उन्हें ऊँचा उठाते हैं। इसी तरह अहले सुन्नत वल जमाअत उन नासिबियों के तरीक़ से भी उपेक्ष करते हैं जो अपने क़ौल या अमल से अहले बैत को कष्ट पहुँचाते हैं।

हम ने इस संक्षिप्त वक्तव्य में जिन बातों का वर्णन किया है वह सब उस सहीह अक़ीदा के अंतर्गत आती हैं जिनके साथ अल्लाह तआला ने अपने संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को भेजा, तथा यही उस फिरक़-ए-नाजिया (मोक्ष प्राप्त कर्ता सम्प्रदाय) अहले-सुन्नत वल जमाअत का अक़ीदा है जिस के बारे में नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया है कि: ‘‘मेरी उम्मत का एक दल हमेशा सत्य पर प्रभुत्वप्राप्त रहेगा, उनका साथ छोड़ देने वाले उन्हें कोई हानि नहीं पहुँचा सकेंगे यहाँ तक कि अल्लाह का फैसला आजाए।’’ तथा आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया: ‘‘यहूद 71 सम्प्रदायों में विभाजित हो गये और इसाई लोग 72 सम्प्रदायों में विभाजित हो गये और यह उम्मत 73 सम्प्रदायों में विभाजित हो जायेगी, वे एक को छोड़ कर सभी नरक में होंगे।’’ इस पर सहाबा ने पूछा: ऐ अल्लाह के रसूल! वह कौन है ? आप ने फरमाया: ’’जो उस तरीक़े पर क़ायम होगा जिस पर मैं और मेरे सहाबा हैं।’’ तथा यही वह अक़ीदा है जिसको सुदृढ़ता के साथ थामना और उस पर जमे रहना तथा उसके विरूध चीज़ों से बचना ज़रूरी है।

जहाँ तक इस अक़ीदा से मुँह फेरने वालों (विमुख लोगों) और इसके विपरीत अक़ीदे पर चलने वालों का मामला है तो वे बहुत प्रकार के हैं, चुनांचे उन में मूर्तियों, बुतों, फरिश्तों, वलियों, जिन्नों, वृक्षों और पत्थरों वग़ैरह की पूजा करने वाले हैं, इन लोगों ने संदेष्टाओं के आमंत्रण को स्वीकार नहीं किया, बल्कि उनका विरोध किया और उनके दुश्मन बन गये, जिस तरह कि क़ुरैश के लोगों और अरब के कुछ वर्गों ने हमारे ईश्दूत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ किया था। वे लोग अपने पूज्यों (देवताओं) से आवश्यक्ताओं की पूर्ति, रोगियों के रोगनिवारण और शत्रुओं पर विजय का प्रश्न करते थे, उनके लिये ज़बह (क़ुर्बानी) करते तथा उनके लिए मन्नत मानते थे, तो जब अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनके ऊपर इसका खंडन और इनकार किया और उन्हें उपासना और आराधना एकमात्र अल्लाह के लिए विशिष्ट करने का आदेश दिया तो इस पर उन्हों ने आश्चर्य प्रकट किया तथा इसे नकार दिया और कहने लगे:

أَجَعَلَ الْآلِهَةَ إِلَهًا وَاحِدًا إِنَّ هَذَا لَشَيْءٌ عُجَابٌ  ख्ص रू5,

‘‘क्या इसने इतने सारे माबूदों (पूज्यों) का एक ही माबूद कर दिया ?! वास्तव में यह बहुत ही आश्चर्यजनक बात है।’’ (सूरत साद: 5).

आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम निरंतर उनको अल्लाह की ओर आमंत्रित करते रहे, उन्हें शिर्क (अनेकेश्वरवाद) से डराते और सावधान करते रहे और अपने निमंत्रण की वास्तविकता की उनसे व्याख्या करते रहे, यहाँ तक कि अल्लाह ने उनमें से जिसको हिदायत देना था हिदायात दी, फिर इस के बाद वे अल्लाह के धर्म में दल के दल प्रवेश किए, इस तरह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम, आपके सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम और भलाई के साथ उनका अनुसरण करने वालों के निरंतर आमंत्रण और लंबे संघर्ष के बाद अल्लाह का धर्म (इस्लाम) सभी धर्माें के ऊपर ग़ालिब आ गया। इसके बाद फिर हालात बदल गए और अधिकतर लोगों पर अज्ञानता ग़ालिब आ गई यहाँ तक कि अक्सर लोग, नबियों और वलियों के सम्मान में अतिश्योक्ति करने, उनको पुकारने, उन से संकट में सहायता मांगने तथा इनके अलावा अन्य प्रकार के शिर्क करने के कारण, जाहिलियत (अज्ञानता काल) के धर्म की ओर पलट गये, और वे ‘‘ला इलाहा इल्लल्लाह’’ का इतना अर्थ भी न जान सके, जिस प्रकार कि अरब के काफिरों ने इसका अर्थ समझा था, तो ऐसी स्थिति पर अल्लाह ही मददगार है।

तथा अज्ञानता (दीन से नासमझी) की अधिकता और नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के ज़माने से दूरी बढ़ने के कारण, हमारे इस युग तक यह शिर्क निरंतर लोगों में फैल रहा है। तथा इन बाद में आने वालों का संदेह वही है जो पहले के लोगों का संदेह था, और वह उनका यह कहना था कि:

هَؤُلَاءِ شُفَعَاؤُنَا عِنْدَ اللَّهِ  ख्يونسरू 18,

‘‘ये अल्लाह के पास हमारे सिफारशी हैं।’’ (सूरत यूनुस: 18).

مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَى ख्الزمرरू 3,

‘‘हम उनकी उपासना केवल इस लिये करते हैं कि ये (बुज़ुर्ग) अल्लाह की निकटता के दर्जे तक हमारी पहुँच करा दें।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 3)

हालांकि अल्लाह तआला ने इस संदेह का खंडन कते हुए इसे व्यर्थ ठहराया है और इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि जिसने उसके अलावा किसी अन्य को पूजा चाहे वह कोई भी हो, तो उसने उसके साथ शिर्क किया और काफिर होगया, जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमाया:

وَيَعْبُدُونَ مِنْ دُونِ اللَّهِ مَا لَا يَضُرُّهُمْ وَلَا يَنْفَعُهُمْ وَيَقُولُونَ هَؤُلَاءِ شُفَعَاؤُنَا عِنْدَ اللَّهِ ख्يونسरू 18,

‘‘और ये लोग अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ों की पूजा करते हैं जो न इन्हें हानि पहुँचा सकें और न इन्हें लाभ पहुँचा सकें और कहते हैं कि ये अल्लाह के पास हमारे सिफारशी हैं।’’ (सूरत यूनुस: 18)

तो अल्लाह ने अपने इस फरमान के द्वार उनका खंडन कियाः

قُلْ أَتُنَبِّئُونَ اللَّهَ بِمَا لَا يَعْلَمُ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ سُبْحَانَهُ وَتَعَالَى عَمَّا يُشْرِكُونَ ख्يونس रू 18,

‘‘आप कह दीजिए कि क्या तुम अल्लाह को ऐसी चीज़ की सूचना देते हो जो अल्लाह तआला को पता नहीं, न आसमानों में और न ज़मीन में, वह बड़ा पवित्र और सर्वोच्च है उन लोगों के शिर्क से।’’ (सूरत यूनुस: 18)

इस आयत के अन्दर अल्लाह तआला ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके अलावा नबियों, वलियों या किसी अन्य की पूजा करना ही शिर्क अकबर (बड़ा शिर्क) है, भले ही उसके करने वाले उसका कोई और नाम रख लें। तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِنْ دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَى﴾ ख्الزمرरू 3,

‘‘और जिन लोगों ने उस के सिवा औलिया बना रखे हैं (और कहते हैं) कि हम उनकी इबादत केवल इस लिये करते हैं कि ये (बुजूर्ग) अल्लाह की निकटता के मर्तबा तक हमारी पहुँच करा दें।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 3).

तो अल्लाह ने उनका खंडन करते हुए फरमाया:

﴿إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَاذِبٌ كَفَّارٌ﴾ ख्الزمرरू 3,

‘‘ये लोग जिस विषय में विवाद कर रहे हैं उस का (सच्चा) फैसला अल्लाह (स्वयं) करेगा, झूठे और अकृतज्ञ (लोगों) को अल्लाह तआला मार्ग नहीं दर्शाता।’’ (सूरतुज़ ज़ुमर: 3).

इस प्रकार अल्लाह तआला ने स्पष्ट कर दिया कि इन लोगों का उसके अलावा किसी अन्य की, दुआ, ख़ौफ (डर) और आशा वगैरह के द्वारा इबादत करना अल्लाह सर्वशक्तिमान के साथ कुफ्र करना है, और उन्हें उनके इस कथन में झुठला दिया किः उनके पूज्य उन्हें अल्लाह से निकट कर देंगे।

शुद्ध अक़ीदा के विरूद्ध और संदेष्टाओं के लाये हुये अक़ीदा के मुख़ालिफ कुफ्र (नास्तिकता) पर आधारित आस्थाओं में से: वर्तमान युग में माक्र्स व लेनिन के अनुयायी विधर्मियों तथा अन्य अधर्म और नास्तिकता के प्रचारकों का अक़ीदा भी है, चाहे वे इसका नाम समाजवाद, या साम्यवाद, या बासवाद, या इसके अलावा कोई अन्य नाम दें। क्योंकि इन विधर्मियों के सिद्धांतों में से यह है कि किसी पूज्य का अस्तित्व नहीं है तथा जीवन माद्दा (भौतिकवाद) का नाम है, तथा उनके सिद्धांतों में से परलोक (आखि़रत) का इनकार, स्वर्ग और नरक का इनकार तथा सभी धर्मों का इनकार है। जो व्यक्ति उनकी किताबों को देखेगा और उनकी वस्तुस्थिति का अध्ययन करेगा तो वह निश्चित रूप से इस वास्तविकता को जान लेगा। तथा इसमें कोई संदेह नहीं कि यह अक़ीदा सभी आसमानी धर्मों के विरूद्ध है और उसके मानने वाले को दुनिया और आखि़रत में बहुत बुरे पणिाम तक पहुँचाने वाला है।

तथा सत्य अक़ीदा के विरूद्ध अक़ीदों में से: कुछ सूफियों का यह अक़ीदा भी है कि उनके कुछ तथाकतित औलिया संसार के संचालन में अल्लाह के साझी हैं और दुनिया के कामों में तसर्रुफ (हेर फेर) करते हैं और ये लोग उन्हें अक़ताब, अवताद, अग़वास तथा इनके अलावा अन्य नाम देते हैं जो इन्हों ने अपने माबूदों (पूज्यों) के लिये गढ़ रखे हैं। यह अल्लाह की रुबूबियत (अर्थात उसके एकमात्र सृष्टा, उत्पत्तिकर्ता, पालनकर्ता और स्वामी इत्यादि होने) में बहुत घिनावना शिर्क है और यह अरब के अज्ञानता युग के लोगों के शिर्क से भी बुरा है ; क्योंकि अरब के काफिर लोगों ने अल्लाह की रुबूबियत (ईश्वरत्व) में शिर्क नहीं किया था, उन्हों ने केवल अल्लाह की उपासना (इबादत) के अन्दर शिर्क किया था। तथा उनका शिर्क केवल खुशहाली में था, जहाँ तक कठिनाई और परेशानी की हालत का संबंध है तो वे उसमें इबादत को केवल अल्लाह के लिए विशिष्ट करते थे, जैसाकि अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿فَإِذَا رَكِبُوا فِي الْفُلْكِ دَعَوُا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ فَلَمَّا نَجَّاهُمْ إِلَى الْبَرِّ إِذَا هُمْ يُشْرِكُونَ﴾ ख्العنكبوتरू 65,

‘‘जब ये लोग नाव में सवार होते हैं तो अल्लाह तआला ही को पुकारते हैं उसके लिये इबादत को खालिस करके, फर जब वह उन्हें खुश्की की ओर बचा लाता है तो उसी समय शिर्क करने लगते हैं।’’ (सूरतुल अनकबूत: 65)

परंतु जहाँ तक रुबूबियत का संबंध है तो वे इसे एकमात्र अल्लाह के लिए स्वीकारते थे, जैसाकि अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿وَلَئِنْ سَأَلْتَهُمْ مَنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ﴾ ख्الزخرفरू 87,

‘‘यदि आप इनसे पूछें कि इन्हें किसने पैदा किया है तो वे अवश्य यही उत्तर देंगे कि अल्लाह ने।’’ (सूरतुज़ ज़ुखरूफ़: 87).

तथा अल्लाह तआला ने फरमाया:

﴿قُلْ مَنْ يَرْزُقُكُمْ مِنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ أَمَّنْ يَمْلِكُ السَّمْعَ وَالْأَبْصَارَ وَمَنْ يُخْرِجُ الْحَيَّ مِنَ الْمَيِّتِ وَيُخْرِجُ الْمَيِّتَ مِنَ الْحَيِّ وَمَنْ يُدَبِّرُ الْأَمْرَ فَسَيَقُولُونَ اللَّهُ فَقُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ﴾ ख्يونسरू 31,

‘‘आप कह दीजिये वह कौन है जो तुमको आसमान व ज़मीन से जीविका पहुँचाता है अथवा वह कौन है जो कानों और आँखों पर पूरा अधिकार रखता है और वह कौन है जो जीवित को मृत से निकालता है और मृत को जीवित से निकालता है और वह कौन है जो सभी कामों का प्रबंध (संचालन) करता है ? तो वे अवश्य यही कहेंगे कि ‘अल्लाह’, तो आप उनसे कहिये कि फिर क्यों नहीं डरते।’’ (सूरत यूनुस: 31).

इस अर्थ की आयतें और भी हैं।

जहाँ तक बाद में आने वाले अनेकेश्वरवादियों का मामला है तो वे दो रूप से पहले लोगों (अनेकेश्वरवादियों) से आगे बढ़े हुए हैं: पहला: यह कि इनमें से कुछ ने रुबूबियत के अंदर शिर्क किया है, दूसरा: यह कि ये खुशहाली और तंगी दोनों हालतों में शिर्क करते हैं, जैसा कि यह चीज़ वह व्यक्ति अच्छी तरह जानता है जो इनके साथ रह चुका है, उनकी हालत को गहराई के साथ जान चुका है और उनके उन कार्याें को देख चुका है जो वे मिस्र में हुसैन और बदवी वगैरह की कब्रों के पास, अदन में ईदरोस की क़ब्र के पास, यमन में हादी की क़ब्र के पास, सीरिया (शाम) में इब्ने अरबी की क़ब्र के पास, ईराक में शैख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी की क़ब्र के पास तथा इनके अलावा अन्य प्रसिद्ध क़ब्रों के पास करते हैं जिनके विषय में अवाम (साधारणजन) ने अतिशयोक्ति (गुलू) से काम लिया है और अल्लाह सर्वशक्तिमान के बहुत से अधिकार इनको दे बैठे हैं, जबकि बहुत से कम लोग ऐसे पाये जाते हैं जो उनके ऊपर इसका इनकार करते हैं और उनके लिए उस तौहीद (एकेश्वरवाद) की वास्तविक्ता को स्पष्ट करते हैं जिसके साथ अल्लाह ने अपने ईश्दूत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और उनसे पहले के संदेष्टाओं को भेजा, फ-इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजेऊन’’ (अतः निःसंदेह हम अल्लाह के स्वामित्व हैं और उसी की ओर पलटने वाले हैं।)

तथा हम अल्लाह से प्रार्थना करते हैं कि वह उनको भलाई की ओर पलटा दे और उनके बीच हिदायत के प्रचारकों को अधिक कर दे, और मुसलमानों के लीडरों और विद्वानों को इस शिर्क से लड़ने, इसे और इसके साधनों को नष्ट करने की तौफीक़ दे, वह सुनने वाला और निकट है।

तथा अस्मा व सिफात के अध्याय में सहीह अक़ीदा के विरूद्ध अक़ीदों में से अह्ले बिदअत: जहमीयह, मोतज़िला और उनके रास्ते पर चलने वालों का अक़ीदा है जिन्हों ने अल्लाह सर्वशक्तिमान के सिफात (विशेषणों) का इनकार करने और अल्लाह सुब्हानहू व तआला को निपुणता के विशेषणों (सिफाते-कमाल) से रहित करनेे तथा अल्लाह तआला को अस्तित्वहीन, निर्जीव वस्तुओं और असंभव चीज़ों के गुणों से विश्ष्टि करने का रास्ता अपनाया है, अल्लाह तआला उनकी बातों से सर्वोच्च है।

तथा इसी के अंतर्गत वो लोग भी आते हैं जिन्हों ने कुछ सिफात का इनकार किया है और कुछ को साबित किया है, जैसे कि अशाइरा, तो जिस बात से बचने के लिये उन्हों ने कुछ सिफात का इनकार किया है वही चीज़ उन पर उन सिफात में भी लाज़िम आती है जिनको उन्हों ने साबित किया है और उनकी दलीलों की तावील की है, इस प्रकार उन्हों ने शरई और अक़ली (बौद्धिक) दलीलों का विरोध किया और उनके बारे में स्पष्ट अंतर्विरोध और टकराव का शिकार होगए। जबकि अहले सुन्नत वल जमाअत ने उन सभी अस्मा व सिफात को अल्लाह के लिये साबित किया है जिनको उसने अपने लिये साबित किया है, या उसके रसूल मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसके लिए साबित किया है, और उसे उसकी सृष्टि की समानता से इस तरह पाक व पवित्र सिद्ध किया है कि उसमें सिफात को अर्थहीन करने का कोई शंका नहीं रहता। इस तरह उन्हों ने सभी दलीलों पर अमल किया, (अस्मा व सिफात में) परिवर्तन और उनका इनकार या उन्हें अर्थहीन नहीं किया, तथा उस अंतर्विरोध और टकराव से सुरक्षित रहे जिसमें उनके अलावा अन्य लोग पड़े हुए हैं, -जैसा कि इसका उल्लेख हो चुका है - और यही दुनिया व आखि़रत में नजात (मोक्ष) और सौभाग्य का रास्ता है और यही वह सीधा मार्ग है जिसे इस उम्मत के सलफ (पूर्वजों) और धर्म-पेश्वाओं ने अपनाया है। और इस उम्मत के अंतिम (बाद में आने वाले) लोगों का सुधार उसी चीज़ से संभव है जिस से इसके पहले लोगों का सुधार हुआ है और वह चीज कुर्आन व हदीस की पैरवी तथा उन दोनों के विपरीत चीजों को त्यागना है।

और अल्लाह ही तौफीक़ प्रदान करने वाला (शक्ति का स्रोत) है, और वही हमारे लिये पर्याप्त है और बेहतरीन वकील (कारसाज़) है, तथा अल्लाह की तौफीक़ के बिना हानि से बचने की शक्ति है न लाभ प्राप्त करने की ताक़त। तथा अल्लाह तआला अपने बन्दे और संदेष्टा हमारे ईश्दूत मुहम्मद, उनके परिवार और साथियों पर दुरूद व सलाम (दया और शांति) अवतरित करे।





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